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क्या फिक्र है तुमको आखिर

Posted On: 14 Oct, 2014 Others में

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चाहे हम सब कितने ही अलग हों या मैं आप से कभी मिली भी न हूं। आपको जानना तो दूर मैने कभी आपको देखा भी न हो।: पर एक चीज जो हम सबके साथ एक जैसी होती है पूरे संसार में और वो है कि हम सभी कभी तो बहुत खुश होते हैं या कभी बहुत दुखी। सुख-दुख तो दिन-रात की तरह हमारे जीवन के आगे पीछे चक्कर काटते रहते हैं। बचपन से लेकर अब तक यही तमाशा चलता रहता है। जब हमारे मन की बात होती है तो लगता है भगवान कितना महान है, कितना दयालु है और फिर अचानक कभी कुछ ऐसा हो जाता है कि जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी तो हम झट से शिकायत करने लगते हैं कि अरे भगवान मेरे साथ ही ऐसा क्यों करता है मैं कितना बद किस्मत हूं। जरा इस बात पर चिंतन करें कि अचानक मिलने वाली खुशी तो हम स्वीकार कर लेते हैं चाहे उसके काबिल हम हो या न हो जैसे कभी-कभी न पढ़कर भी अच्छे नंबर आ जाते हैं पर अचानक मिलने वाले दुख चाहे थोड़े ही हो हमारे लिए बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है। जरा सा कुछ हुआ नहीं जो हमारे अनुसार नहीं हुआ हमें लगता है कि सब बेकार है। जीवन के प्रति हमारा ऐसा रवैया हमें न तो आज की खुशी मनाने देता है क्यों कि हमें डर है कि कल न जाने क्या होगा और न ही हमें भविष्य के लिए उचित रुप से तैयार होने देता है और न ही गुजरे हुए पलों को भूलने देता है। पर आजकल मैं जीवन के प्रति अपने इस रवैये से बहुत तंग आ कर अब कुछ रचनात्मकता के पल जीने चाहती हूं और अपने विचार आप सभी के साथ बांटना चाहती हूं–

क्या फिक्र है तुमको आखिर

टूटते रहते हैं हम सभी पर गमों के बादल
पर क्या फिक्र है, जब मन की बहारें साथ हों

गमों के बादल आए हो, तुम अरे छाओ मुझ पर , छाओ मुझ पर
यकीन है मेरा, तुम तो बादल हो , उड़ ही जाओगे——

दुखों की बारिश होनी है तो रानी जम के बरसना
यकीन है मेरा बारिश के बाद ही खिली धूप मुस्काती है——

कई बार आंधियों ने मेरे सपनों को बिखेरा है
हवाओं के तेज झोंकों ने मेरी राहों को तोड़ा-मरोड़ा है
पर यकीन है मुझे चाहे कितना ही बड़ा हो बवंडर
इसकी औकाद ही नहीं कि चीर सके मेरे विचारों का समुंद्र
यकीन है मेरा कि तुफानी हवाएं भी ठंडी हवाओं में बदल जाती हैं——-

तुम भी जान लो मैने तो यह जान लिया है
इस जीने के मक्सद को मैने आखिर पा लिया है
दिया है हर आत्मा को इक पार्ट जो हमें निभाना है
इन चमकते दमकते जिस्मों का बस नाम का पहनावा है
ये जो चलते चलते हर काम को करते–करते
असफलता की परछाईयां हमें घेरे हैं
ये और कुछ भी नहीं अब के या तो पिछले जन्मों के कर्मों के ही फेरे हैं
यकीन है मेरा यह जिन्दगी हमारे शुभ कर्मों की ही भरपाई है——-
खुदा अब न मैं न रखु तेरे आगे मेरी अंगणित ख्वाईशों के अंबार
पर दे दे मुझे इतनी शक्ति कि सह सकुं मैं, हर दुख और सुख का पहाड़
देदे हिम्मत, देदे ताकत, देदे इच्छा की दौलत मुझको
निभा सकुं तेरा हर फरमान मैं खुशी-खुशी अब, बक्श दे बस ऐसी जन्नत मुझको——-

मीनाक्षी भसीन 14-10-14© सर्वाधिकार सुरक्षित

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 16, 2014

हवाओं के तेज झोंकों ने मेरी राहों को तोड़ा-मरोड़ा है पर यकीन है मुझे चाहे कितना ही बड़ा हो बवंडर इसकी औकाद ही नहीं कि चीर सके मेरे विचारों का समुंद्र ! सार्थक और विचारणीय रचना ! आपको बधाई !

yamunapathak के द्वारा
October 16, 2014

सही कहा आपने अचानक मिले खुशी को स्वीकार कर लेते हैं पर ……को नहीं .यही मानवीय स्वाभाव है और ज़िंदगी का मानसून और वसंत इसी एक रहस्य पर टिका भी है.बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है. साभार


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